Friday, December 16, 2016

बस एक छोटी सी बात ही तो है।

बस एक चुप........... "एक बात पूछूँ?" "पूछो जी।" "इस बार तुम ने ये सब क्यों किया?" "क्योंकि मुझे लगा तुम ये सब चाहती हो।" "अच्छा! पर तुम्हें इस बार ही क्यों लगा कि मैं चाहती हूँ, ये सब।" "मतलब? मैं समझा नहीं? " "मतलब ये कि जब पहली बार हम अकेले में, तुम्हारे घर पर मिले थे और तुम ने मुझे सिर से पैर तक सहलाया था, तब क्यों नहीं लगा कि मैं" चाहती हूँ "।" "तब मुझे डर लगता था।" "डर! किससे?" "यार!!मम्मी ने हमेशा यही समझाया था कि किसी का गलत फायदा नहीं उठाना चाहिए। जानती हो उस दिन कितनी गालियां पड़ी मुझे और पिटाई भी हुई थी।" "ओह!!!" "चलो ठीक है। पर उसके बाद जब 10 साल बाद हम मिले और तुम मुझे कमरे में ले कर गए, उस दिन तो हम बड़े हो चुके थे और एक-एक बच्चे के मां-बाप भी बन चुके थे, तब तुम क्यों रूक गए थे?" "तुमने ही तो कहा था कि बेटा इंतजार कर रहा है, अब बच्चों से बढ़कर थोड़ा है ना कुछ।" "और इस बार.........12 साल बाद तुमने कुछ नहीं सोचा बस जबरदस्ती करी, थक गए थे कया इतने साल सोच सोच कर?" "मैनें कहा ना कि मुझे लगा कि इस बार तुम भी चाहती थी और मैं हर बार की तरह इस बार भी तुम्हें खोना नहीं चाहता था।" "मतलब कि तुम्हें लगा कि इस बार अगर नहीं हुआ तो मैं फिर से तुम्हें छोड़ कर चली जाऊँगी?" हाँ, यार! अच्छा बस करो अपने सवाल-जवाब, पास आओ, हर बार पुरानी बातें याद करा देती हो। पता है रोना आ जाएगा मुझे। " "रोना???" हाँ यार! यही सोचकर कि काश तुम मेरी बीवी होती, मेरे बच्चों की माँ। " "फिर क्या होता?" "तुम्हारा सिर!!!! अच्छा यार, अब हम वो करते हैं जो मुझे अच्छा लगता है।" "नहीं?! मुझे वो सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।" "मुझे तो लगता है और मैं वोही करूंगा।" "प्लीज नहीं!!! " "बस चुप अब।" और हर बार की तरह फिर से एक चुप। कितनी बातें मन में दब जाती हैं।"मैं तुम से बार-बार मिलने आती थी क्योंकि पूरी दुनिया में अकेले तुम ही थे जो कभी मुझ से जबरदस्ती नहीं करते थे,मेरी भावनाओं को समझते थे, तुम्हारा और मेरा प्यार, मेरा गरूर था क्योंकि वो अनछुया और पवित्र था। अफसोस यही रहेगा कि वो था।" ये बात तुम समझ नहीं पाओगे इसलिए...... "चुप"।"मैं तुम से बहुत प्यार करता हूँ। खुद से भी ज़्यादा, सबसे ज्यादा, रब से भी ज़्यादा।" कितना अच्छा लगता है जब कोई ये कहता है मगर सच में इतना प्यार होता है? मान लिया, सबसे और रब से ज़्यादा पर क्या खुद से भी ज्यादा????? पहली मुलाकात - तुम ये पहन कर आना, मुझे अच्छा लगता है।, दूसरी मुलाकात- मेरे लिए भरी बस में गाना सुनाओ। तीसरी मुलाकात - मुझे किस करो। और उसके बाद मैं तुम्हें सिर से पैर तक प्यार करना चाहता हूं। इन सब के बीच में कितने ना, कितनी शर्म, कितना भय था, किसने देखा, कौन देखना चाहता है। अंत में हर सवाल का एक जवाब, तुम जो चाहती थी मैं वोही तो करता था। कमाल है इंसान को कई बार खुद नहीं पता चलता, अपनी चाहत का मगर दूसरे को पता चल जाता है। "यही तो प्यार है कि मैं तुम्हें कितनी अच्छी तरह समझता हूँ।" "अच्छा!!!!" मान लिया पर मेरा ना क्यों नहीं समझ पाते, मेरी हाँ क्यों नहीं समझ पाते, मेरी इच्छाएं क्यों नहीं समझ पाते, मेरी आँखों में बसी नमी क्यों नहीं समझ पाते, मेरा रोना, मेरा हंसना, मेरी मजबूरियाँ, मेरी कमियां, मेरी ताकत, मेरी जिद, मेरा संघर्ष........... क्यों नहीं समझ पाते। "क्योंकि ये सब बाते ना औरतों की नौटंकी है। जब इतना प्यार मिल रहा है तो और क्या चाहिए तुम्हें।" हर बार की तरह चुप............प्यार बलिदान माँगता है, दोनों में से एक तो समझ ही जाता है ये बात।

Thursday, December 15, 2016

Few from my heart

From black suits you I have never heard this from friends or heard this discussed anywhere, but that day when he and i had sex for the first time, i realised two people who are genuinely in love can be strangers sexually as well. I'm not taking about sexual compatibility, I'm talking about sexual prefrences.. It wasn't just the moment i remember, but the way it all happened....... I wanted him to go slow and take his time. I was his anyway, but he was in a hurry as if i was going to slip away from him, he seemed possessed with lust. I knew he loved me, but i was disturbed by the way he seemed to devour me. I wanted him to go slow. But he was all over me. He bit me, pinched me, and even spanked me. I almost felt like crying but didn't......

Few from my heart

Some things can only burn, not turn into ashes. My passion for you is one such thing. When a committed man or woman is seduced, it can either be natural vulnerability to be lured or because they don't love their partner. I come to your bedroom wearing a story, you strip me bare, seeking sense. I tease you with my naked thoughts, and we make love, intense......

Few lines from my heart

From black suits you, I often wonder, at which point does a love story really begin? Does it begin when the individuals involved see each other in the days that follow or, when they meet up for the first time after they have thought about the other? And revel, in the nights that follow, in the suddenly realised joy of one's own heart that was hitherto unleashed,. Or when they start talking at length and discover how similar or different they are, depending on whatever excites them more, or when they begin to know each other with every passing meeting and surrender, quite involuntarily, to the mystery that the other person seems to be. Or, do they simply fall in love?like when they come togather and there's no alternative but for a love story to begin.

Thursday, September 1, 2016

First story part2

"उसकी सुंदर लिखाई की बहुत तारीफ हुई थी आज कलास में, बस वोही देखना था कि कैसे लिखता है वो" परी ने थोड़ा मायूस होते हुए कहा। मैंने बड़ी मुशकिल से अपनी हंसी को रोकते हुए मन में सोचा, यार कोई तो अच्छा सा बहाना बना लेती।चलो अब तो ये काम करना ही पडे़गा। मैंने तीन कदम उठाए और झट से जा के बोला " तुम्हारी कापी चाहिए थी"। "क्यों"।उसने कुछ रूखाई और कुछ आश्चर्य से जवाब दिया। " तुम्हारी लिखाई देखनी है, सुना है कलास में सर बड़ी तारीफ कर रहे थे"। मैंने कुछ ज्यादा ही straightforward होते हुए कहा। "अच्छा ये लो देख लो" उसने अपनी कापी मेरी तरफ बढ़ा दी। मैंने झट से कापी पकड़ी और फट से जा के परी को देते हुए बोला " लो देखो लिखाई"। परी ने कुछ झिझकते हुए कापी पकड़ी। पीछे मुड़ कर तो नहीं देखा मैंने पर परी के भाव देख के पता चल गया कि उन लड़को के ग्रूप का धयान हमारी तरफ ही था। हम तीनों फटाफट वहां से चल दिए। मगर केवल कापी लेना ही मेरा काम भर नहीं था अभी तो मुझे उसे वापस भी देनी थी। एक अजीब सी मुशकिल में डाल लिया था मैंने खुद को अपनी प्यारी सहेलियों की मदद करने के चक्कर में। अब तो ये रोज का सिलसिला बन चुका था। दू "उसकी सुंदर लिखाई की बहुत तारीफ हुई थी आज कलास में, बस वोही देखना था कि कैसे लिखता है वो" परी ने थोड़ा मायूस होते हुए कहा। मैंने बड़ी मुशकिल से अपनी हंसी को रोकते हुए मन में सोचा, यार कोई तो अच्छा सा बहाना बना लेती।चलो अब तो ये काम करना ही पडे़गा। मैंने तीन कदम उठाए और झट से जा के बोला " तुम्हारी कापी चाहिए थी"। "क्यों"।उसने कुछ रूखाई और कुछ आश्चर्य से जवाब दिया। " तुम्हारी लिखाई देखनी है, सुना है कलास में सर बड़ी तारीफ कर रहे थे"। मैंने कुछ ज्यादा ही straightforward होते हुए कहा। "अच्छा ये लो देख लो" उसने अपनी कापी मेरी तरफ बढ़ा दी। मैंने झट से कापी पकड़ी और फट से जा के परी को देते हुए बोला " लो देखो लिखाई"। परी ने कुछ झिझकते हुए कापी पकड़ी। पीछे मुड़ कर तो नहीं देखा मैंने पर परी के भाव देख के पता चल गया कि उन लड़को के ग्रूप का धयान हमारी तरफ ही था। हम तीनों फटाफट वहां से चल दिए। मगर केवल कापी लेना ही मेरा काम भर नहीं था अभी तो मुझे उसे वापस भी देनी थी। एक अजीब सी मुशकिल में डाल लिया था मैंने खुद को अपनी प्यारी सहेलियों की मदद करने के चक्कर में। अब तो ये रोज का सिलसिला बन चुका था। दूसरे दिन मैंने एक कदम और बढ़ाते हुए उसका नाम भी पुछ ही लिया। तो मेरे तीसरे कापी दोस्त का नाम था चेतन। लिखाई के बारे में पता चला कि जनाब ने अपने पापा से खूब पिटाई खाई थी इसके चक्कर में, तो असल में तारीफ के हकदार पापा थे, जिन्होंने गधे को घोड़ा बनाया था। उसकी राम कहानी मतलब अच्छी लिखाई का इतिहास जानने के साथ ही एक और मुसीबत मेरे गले पड़ गई वो यह कि अब महाराज नें मेरी लिखाई को सुंदर बनाने का जिम्मा उठा लिया। साफ शब्दों में लिखूं तो मेरे रूप में उसे एक अच्छा मुर्गा मिला अपने पापा की ज्यादतियों का बदला लेने के लिए।